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‘कमनीता यायावर’ के साथ मोरचे पर

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– निकोलाय ज़्बेरिया (१९०८-१९९०) –

एक विदेशी का हिंदी लेखन

ज़रूर कमनिता यायावर संसारव्यापी साहित्य की सबसे सुंदर पुस्तकों में से एक है। अकारथ नहीं कि उपन्यास को नोवेल पुरस्कार दिया गया था और उसका संसार की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है॥

हमारे देश (रोमानिया) में जहां भारतीय आध्यात्मिकता के लिए वेशेष ग्रहणशीलता सदा होती थी, ग्येल्लेरूप की रचना को बड़ी सफलता मिली और दे बार अनुवादित एवं प्रकाशित हुई॥

में पहली जवानी से ही कमनीता यायावरपर मनमोहित था और तब से वह मेरी सबसे प्यारी पुस्तक हो गई। मुझे ऐसे खंड जैसे यायावरी में‘ ‘अंगुलीमाला‘, ‘वसीथी का वसीयतनामाइत्यादि नाटक के असली अंकों की भांति सदा प्रतीत होते थे॥

जब में मोरचे पर प्रस्थान के लिए तैयारि कर रहा था, तब मैंने सोचा, एक पुस्तक अपने साथ भी ले लुं। मैंने अपने पुस्तकसंग्रह पर दृष्टिपात किया , जब मेरी नज़र कमनीतापर पड़ी, तब अपने आप चुनाव हो गया॥

मैं चेकोसलोवेक मोरचे पर था। युद्ध समाप्ति के निकट आ रहा था। १९४७ के वर्ष का बसंत आरंभ होने लगा था और हम सूरज की धीमी किरणों से लाभ उठाने की कोशिश कर रहे थे॥

सन १९४४ के शरद ऋतु से प्रारंभ हुई, फैजी कार्रवाइयों की भिंत, हम गतियुद्ध करना जारी रखे हुए थे और कोई नदी पार करने के लिए ही केवल कई दिन के लिए रुकते थे, जिस समय में अपनी कमान नदी से पार उतारने की तैयारी करती थी। अब की बार हम पग्रोननदी के निकट आ गए थे, जिसकी ढलवां चट्टानों से किनारा लगाई हुई, गहरी और अंधेरी घाटी, द्वर से हमें डराती थी॥

चूंकि बड़ी लड़ाइयां समतल प्रदेश पर, कहीं उत्तर दिशा की और हो रही थीं, जहां टैंकों की सेनाएं सामने आ सकती थीं, हमारे सामने से जर्मनफसिस्ट फ़ौजें, जो कमज़ोर और संख्या में घट गई थीं, हमारी आक्रमणकारक कार्रवाइयों पर कफ़ी दृबंलता से प्रतिक्रिया कर रही थीं। उनके प्रत्याक्रमणात्मक प्रयत्न कमज़ोर थे और वे सदा हार रहे थे॥

अब की दफा जान पड़ता था की हम स्थिर युद्ध की कुछ और लंबी मंजिल में अंदर आ गए हैं। खामोशी जो स्थापित हो गई थी और सूरज जो हमें गरमाता था, यह सब कुछ पहुंचात था कि अपने व्याक्तिगत गड्ढों में हमारा रहना इतना ही असहूय नहिं हो। लेग भी ज़्यादा उदास दिखाई नहीं पड़ते थे, जिस प्रकार खंदक के युद्ध में हो जाते हैं॥

इस हालत में बगलवाली सैनिकट्कड़ियों के अकसरों के बीच में भेटें आमतौर पर होती रहती थीं। एक दिन जब सूरज निकला हुआ धा , नशीनगनों के बटालियन की कंपनी के निशानाबाजों की पलटन का कमांडर मुझे देखने आया। छोटा लेफ़्तिनेंत स्तंका बहुत जवान, सुखदृश्य, बड़ी नीली आंखों वाला अफ़सर था। आपसी बातचीत में, मुझे पता लग गया कि वह संगीतमहाविद्यालय का विद्यार्थी था और कि वह अपनी मां को पूजता है। दूसरी बार उसने मुझसे कहा कि उसको मृत्यु का पूर्वभास है और कि सबसे अधिक अपनी मां का भग्य उसको घबरा देता है। अब की बार हमने लगभग एक घंटे तक बात की। हमने अपनी युद्धनीति संबंधी हालत सिपाहियों की जंगी हिम्मत और हमारे बीच के जोड़ की सुरक्षा के प्रश्नों पर बहस की। गड़ढ़े में नज़र डाल कर और उसमें कमनीता को देख कर जवान अफ़सर हर्षोल्लास से भर उठा। उसने कहा

‘कमनीता यायावरकहां, मोर्चे पर? यह शानदार बात है। मैंने इस पुस्तक के बारे में सुना है। उसे पढ़ने का मैं बहुत इच्छुक धा, पर पढ़ नहीं पायाभरती आईयह शानदार बात है। मैंने उत्तर दिया,

– ‘सचमुच कमनीताअसाधारण पुस्तक है। उसको वेदियां स्थापित करने के योग्य है। कूच के सारे समय के दौरान में यह पुस्तक मेरी अच्छी दोस्त रही है। मैंने उसे अपने नक्शेवाहक थैले में बराबर रखा। उस अद्भुत पुस्तक के कई पृष्ठों के पाथ ने युद्ध के अभाग्य को भूल जाने और मनोबल बनाए रखने में मेरी सहायता की॥

एकदम फ़ौजी आसन ले कर (मैं कप्तान था) अचानक विचार की प्रेरणा से बहुत उत्तेजित हुए अफ़सर ने मुझे संबोधित किया:

– ‘अगर गुस्ताखी न हो तो मैं आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि आप मुझे अल्पतम समय के लिए उसे दे दें। अवकाश में , जो हमें अब है, मैं उसे जल्दी पढ़ लूंगा। मैं अपनी आंख की पुतली की तरह उसकी रक्षा करूंगा। मुझे पुस्तक पूज्य है॥

खुशी से देता हूँ‘, मैंने कहा! ‘यहाँ, मैं तुमको एक निधि सुपूर्थ कर रहा हूँ। तुम दोतीन दिन तक उसे रखा सकते हो। पढ़ने के बाद हम उस पर विचार करेंगे। सोचता हूँ की वह फ़िल्माने के लिए भी अच्छी है। इस बात पर भी सोचो। मैं तुम्हारा मत जानना चाहता हूँ॥

प्रसत्न अफ़सर ने पुस्तक ले कर, उसे चिंता से नक्शाधारी थैले में रख कर , फ़ौजी सलाम किया और चला गया। दूसरे दिन दोपहर तक, शत्रु ने प्रचंड गोलाबारी की नरक लगभग दो घंटे जारी रहा जंगली और पथरीले प्रदेश में, जैसा की हमारा था, घड़के और अधिक भयानका , आतंक फैलाने वाले ही प्रतीत हुए। शत्रु की गोलाबारी रुकने के बाद, इस संभावना को ध्यान में रख कर कि इतनी जोरदार गोलाबारी के बाद जर्मन और जबरदस्त हमला छेड़ेंगे, हम अपने स्थानों पर शाम तक रहे। इसी कारण से मैंने हुक्म दिया कि मुख्य निशानेबाज मशीनगनों के पास अविभाजित रहें। परंतु, अनुमान पूरा नहीं हुआ, केवल धोखे में तो पड़ा॥

संध्या तक शांति की स्थापना के बाद और जब लोग बहाली में आने लगे, मैंने छोटे लोफ़्टिनेंट सतंका को देवदारूओं में अपनी और आते देखा। जब वह निकट आ गया, तब मैंने अथजला, अधकोयला हो गया पृश्ता और पुस्तक के शेषांस उसके हाथ में रखे हुए देखे। वह खिन्र था॥

– ‘कुछ बात हुई? मैंने विस्मयपूर्ण पूछा।

विकृत चेहरे से, बहुत उत्तेजित, अफ़सर सूचित करने लगा:

मैं अपने व्यक्तिगत गढ़े की तली परपुस्तक छोड़ कर निशानेबाजों का निरीक्षण का निरीक्षण करने के लिए चला गया इसी बीच में गोलाबारी छिड़ गई। जहाँ मुझे जगह मिली वहीं मैंने पनाह ले ली। जब गोलाबारी रुक गई , तब मैं अपने गड़ढे के पास लौट आया। वहां मैंने देखा कि तोष के गोले के कारण गहरा गड़ढा हो गया है। मैंने नक्शाधारी थैलाम खोजा, मिट्टी खोदी, परंतु टुकड़े टुकड़े हुए तथा पुरजेपुरजे उड़े, धज्जियों के रूप में मुझे पुस्तक के ये अवशेष ही प्रप्त हो सके। सब कुछ केवल कोयला। मैं बहुत लज्जा का अनुभव कर रहा हूं। आपसे क्षामा मांग रहा हूँ॥

तुम्हारा कोई दोष नहीं।मैंने उससे कहा। चिंता मत करो। क्या किया जा सकता है जब गोला गड्ढे में सीधा पड़ गया? खुशी की बात है कि तुम वहाँ नहीं थे। यह तथ्य कि तुम्हारे प्राण बच गए, यह अर्थ रखता है कि तुम्हारे पूर्वाभास मायावी है। अपने सिर में भी नकारात्मक धारणाएं मत घुसाओ। हम सभी स्वदेश में भलेचंगे लौटेंगे। घर पर मेरे पास कमनीतामूल में है। अपनी मां के लिए भी चिंतातुर मत हो, वे स्वयं बच निकलेगी। कलपरसों युद्ध समाप्त हो जाएगा। जो कठिन था, वह बीत गया। हमने सर्दी से छुटकारा पाया, यह बड़ा मामला है। जब हम घर पर लौटेंगे, तब मैं तुम्हारी मां से परिचित होने के लिए आऊंगा, ताकि उनसे कहूं, तुम उनके लिए कितना बहुत सोचते हो। जहाँ तक पुस्तक की बात है, उसकी कुछ परवाह नहीं॥

यह कमनीता यायावरकी दुखद कथा थी।

दो दिन के बाद हमने फिर से आक्रमण शुरू किया। हमें प्रोन नदी के उस पार पुल का सिर करना चाहिए था, ताकि इसके बाद उस पर उत्तरें। परंतु इसी बीच में शत्रु ने मोरचाबंदी बना दी और, तोपखाने तथा जंगी हवाई बेड़े की सारी सहायता के बावजूद , हमारा बढ़ाव अनेक बार नाकामयाब रहा। एक कोशिश में , उस विरोधी किलाबंदी को कुचलने के लिए, जो अपने प्राणघातक फायर से हमारे बटालियन की रोकथाम करती थी, छोटा लेफ़्टनेंट स्तांका , कई सिपाहियों के साथ, मशीनगन के शंकुमें पड़ गया। उसका सारा ! शरीर गोलियों से छलनी हो गया। वह मर कर केवल एक शब्द, केवल एकमात्र आहूवान का उच्चारण कर सका: ‘मां!

रोमानिया, बुकरेस्त

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