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भारत और रूमानिया का संस्कृतिक सम्बन्ध

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– निकोलाय ज़्बेरिया (१९०८-१९९०) –

समन्वय’ भारत के संस्कृतिक समन्वय की अग्रदूत केन्द्रीय हिन्दी संस्थान आगरा 1969-70)

सब से पहले दो लोकतात्विक उपन्यासों ने रूमानियावासियों को भारत का परिचय कराया ये दो उपन्यास हैं १ एलेक्जण्डर दो ग्रेट की कहानी जो अलेक्सान्दर माकेदोन नाम से प्रसिद्ध है और २ वालो आम और इओआसाफ‘ – पहला लोक उपन्यास मिस्र में और दूसरा ईरान या सीरिया में लिखा गया था। वहाँ से ये दोनों उपन्यास यूनान में लोक प्रिय हुए, यहाँ से सारे दक्षिणी यूरोप में, फिर वहाँ से १७ वीं शताब्दी में रूमानिया में डेन्यूब नदी के दक्षिण की स्‍लाव जाति के जरिये पहुँचे। संक्षेप में इन दोनों उपन्यासों का सार निम्न प्रकार है एलेक्जेण्डर दी ग्रेट माकेदोनिया के राजा पृत्र हैं। उन्होंने बचपन में ही तीव्र बुद्धि का परिचय दे दिया था। अरस्तू उनको दर्शन और ज्योतिष पढ़ाता था। वे बड़े साहसी हैं। जब तातार माकेदोनिया पर आक्रमण करते हैं, तब वे उनका मुकाबला करते हैं और उन्हें बाहर खदेड़ देते हैं। अपने पिता राजा फिलिप की मृत्यु के बाद सिकन्दर अपनी संसारविजय यात्रा पर निकले। उनहोंने बड़ी जल्दी में मिस्र और एशिया के दक्षिणपश्चिम के सारे देशों पर अधिकार कर लिया। भारत के महाराजा पुरु की मदद से वे ईरान के महाराजा डेरियस को जीतते हैं और उनकी पुत्री रुक्सन्द्रा से वीवाह करते हैं। बेबीलोन की विजय के बाद वे कुछ कल्पनामय क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं। इन कल्पना के क्षेत्रों में चिेंटियों के देश, बौनों के देश, राक्षसों के देश और स्वर्ग का साम्राज्य आता है। स्वर्ग से उनको अमृत की बोतल मिलती है। इसी समय किसी बात पर वे पुरु से झगड़ पड़ते हैं। वे पुरु का पीछा करते हुए भारत आते हैं और उनका वध कर देते हैं। फिर मत्स्य कन्‍्याओं के देश को जीत कर नरक तक पहुँचते हैं। इसके बाद पुनः बेबीलोन लौटते हैं, जहाँ उनकी मृत्यु हो जाती है और रुक्‍सांद्रा उनकी तलवार से आत्मधात कर लेती है॥

स्पष्ट है की उपन्यासों में ऐतिहासिक तत्यों और काल्पनिक कथानकों का विचित्र और सहज मिश्रण हुआ है। इस प्रकार सिकन्दर महान के उपन्यास ने रूमानियन पाठकों को भारत के बारे में कुछ अतिशयोक्ति पुर्ण धारणाएँ दीं॥

दूसरा उपन्यास – ‘वालों आम और इओओआ साफ! एक आधियात्मिक उपन्यास है। उसने बौद्ध धर्म के प्रारम्भिक काल के कल्पनामय वातावरण से रूमानियन पाठकों को परिचित कराया॥

इओअओआसाफ अवेनीर राजा का पुत्र है, जो ईसाइयों पर अत्याचार करता है। एक ज्योतिषी उसके बारे में यह भविष्यवाणी करता है कि इओआसफ ईसाई धर्म की और आयेगा और बड़ा सन्यसी बनेगा महाराजा शानदार महल में राजकुमार को बन्द रखते हैं, ताकि इओआसाफ दुनिया की बुराई न देख सके। लेकिन राजकुमार दुःखी रहता है। महाराजा उसको खुश रखने का यत्न करते हैं। यद्यपि महाराजा अवेनीर सभी प्रकार से एह्तियात करते हैं किन्तु राजकुमार को क्रमशः एक अन्धा, एक कोढ़ी और एक शव देखने को मिल जाता है। वह इस नतीजे पर पहुँचता है कि जीवन से बीमारी, कष्ट और मरण अविभाज्य हैं। इओआसाफ गहरे सोच में पड़ता है। उसी समय वार्ला आम जो महान सन्यासी, थचानी और मसीही गुरु हैं, आते हैं। वार्लाम इओअझओ साफ को दुनियावी जीवन की निस्सारता और कष्टों को बताकर उसे मसीह बनाते हैं। उधर इओआसाफ को सांसारिक ऐश्वर्य का लालच हो, इसके लिए महाराजा उसे आधा राज्य दे देते हैं, पर राजकुमार उसे लेने से इन्कार करता है और वारला आम के साथ रेगिस्थान चला जाता है जहाँ सनियासी होकर उसने अपना सारा जीवन बिताया॥

स्पष्ट है कि विशेषतः उपन्यासों के शुरू में बुद्ध के जीवन की किंवदन्ती का अनुकरण है, जिसका ललितविस्तारबौद्ध ग्रेन्थ में वर्णन किया गया है। वस्तुतः वार्लाम और इओआसाफकी कथा अपने में मौलिक नहीं है, वरन यह ललितविस्तरबौद्ध ग्रन्थ की कथा को ईसाई धर्म के अनुकूल ढाल लिया गया है॥

यह सर्वविदित है कि १७ वीं और १८ वीं शताब्दियों में ये उपन्यास रूमानियन प्रदेशों में सबसे अधिक लोकप्रिय किताबें थीं। बाद में श्८ वीं शताब्दी के अन्त में भौगोलिक साहित्य दिखाई देने लगा जिसके जरिये रूमानियन पाठकों को भारत के बारे में सहीसही जानकारी मिली॥

भारत से सीधा सम्पर्क केवल १९ वीं शताब्दी के पुवार्द्ध में शुरू हुआ। इस अपधी में दो रूमानियन यात्री पहुँचे। उनके नाम थे यो० मा० होनिगबर्गेर और अलैकुगीका॥

१९ वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में रूमानियन साहितिय पर भारतीय प्राचीन चिंतन ने बहुत अधिक प्रभाव डाला। भारत की सैकड़ों वर्ष प्राचीन संस्कृत, दर्शन और आध्यात्मिकता उस समय के सबसे बड़े तीन प्रतिनिधियों के माध्यम द्वारा रूमानियन साहित्य में पहुँची। ये प्रतिनिधि थे बो० पे० हश्देउ (ये लेखक , कवि और भाषा वैद्यानिक थे ), मि० एमिनेस्कु (सब से बड़ा रूमानियन कवि ) तथा गे० कोश्बूक (जो एक रूमानियन कवि थे )। जमंनी को छोड़कर यूरोप के किसी भी देश के साहित्य पर संस्कृत, प्राचीन भारतीय दर्शन और चिंतन ने इतना प्रभाव नहीं डाला, जितना रूमानियन साहित्य पर डाला है॥

इस प्रकार बो० हश्देउ ने संस्कृत के अध्ययन के आधार पर तुलनात्मक भाषाशस्त्र में बहुत महत्वयू्ण किया। सन्‌ श्य८य८९२ में उन्होंने बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में इस विषय पर लेक्चर दिया। बो० पे० हृ्देउ ने दर्शन पर पुस्तक भी लिखी है जिसमें देख सकते हैं कि वे भारतीय आध्यात्मिक धाराओं के श्लोत से कितने प्रभावित हैं। लेकिन भारतीय विचारधारा का शक्तिशाली प्रभाव रूमानियन साहित्य में मि० एमिनेस्कु के ही माध्यम से आया, जो रूमानियन कविता प्रतिभासम्पत्र कवि था॥

यह सर्वविदित है पश्चिम के शिक्षित लोगों में से अधिकांश लोग शोपनहावर के ही माध्यम से प्राचीन भारतीय विचारधारा तक पहुँचे जिसकी रचनाएँ वेदांत और बौद्ध ग्रंथों के हवालों से भरपूर हैं। मि० एमिनेस्कु प्राचीन भारतीय चिन्तन तक शोपनहावर के माध्यम से ही पहुँचे थे। मि० एमिनेस्कु ने वियना और बर्लिन में दर्शन का अध्ययन किया और शोपनहावर के दर्शन से पुर्ण रूप से प्रभावित हुए। वे विचार जिनसे मि० एमिनेस्कु सबसे अधिक प्रभावित हुए थे, जिन्हें उन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया हैं; वे हैं अद्वैतवाद, मायावाद और कुछ बौद्ध विचार॥

एमिनेस्कु जीवन की समस्याओं और अस्तित्व की पहेलियों से बहुत बेचैन हुए। उन समस्याओं के हल की खोज के लिए वे ऋग्वेद, उपनिषदों और बौद्ध ग्रंथों के अंतरंग में प्रविष्ट हुए। उन्होंने लगभग सन्‌ १८९० में विद्यार्थी जीवन में संस्कृत के अध्ययन में बहुत समय लगाया और उन्होंने एक संस्कृतरूमानियन शब्दकोश बनाने का भी काम किया॥

कवि गे० कोश्बूक कवि गे० कोश्वूक भारतीय प्राचीन विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने रूमानियन भाषा में अभिद्यान शाकुन्तलम‘, ऋग्वेदऔर महाभारतके कुछ खण्डों का अनुवाद किया॥ २० वीं शताब्दी में भी बहुत स रूमानियन कवि और लेखक भारतीय चिन्तन से प्रभावित हुए। उनमें लुचियान ब्लागा, ईओन पिलात , मिर्चा एलियादे आदि नामों का हवाला दिया जो सकता हैं। मिर्चा एलियादे ने भारत की यात्रा भी की थी। उन्होंने भारत के प्राचीन और आधुनिक जीवन के विषय में कुछ उपन्यास और ग्रन्थ भी लिखे हैं॥

संस्कृत और हिन्दी का अध्ययन १९ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत का अध्ययन शुरू करने के लिए जोजियान ने एक कार्यक्रम चलाया। जोर्जियान रूमानिया के प्राच्यवेत्त और प्रसिद्ध विद्वान हैं। उन्हिं की कोशिशों के फलस्वरूप रूमानिया भाषा में संस्कृत से अनुवाद का कार्य भी प्रारम्म हुआ॥

प्रथम और द्वितीय विश्व महायुद्धों के बीच में संस्कृत पुस्तकों के अनुवाद का रूमानिया भाषा में ताँता सा लग गया। इन रचनाओं का प्रभाव रूमानियन रचनाओं पर भी पाड़ा। इस तरह भारत रूमानियन संस्कृतिक क्षितिज के और नजदीक आया। इस काल में महाभारत और रामायणके कुछ भागों का अनुवाद रूमानियन भाषा में हुआ। शाकुन्तलम‘, ‘भगवद्गीताआदि रचनाओं का भि रूमानियन भाषा में अनुवाद हो चुका है॥

रविन्द्रनाथ ठाकुर की रूमानिया यात्रा बाद के भारत और रूमानिया का सम्बन्ध और घनिष्ठ हो गया। दूसरे बिश्व महायुद्ध के बाद तो रूमानिया और भारत के बीच समीपता तथा मित्रता और बढ़ी। इन दोनों देशों में संस्कृतिक विनिमय का अभियान शुरू हुआ, जिसके परिणाम स्वरूप इनके बीच बहुमुखी सहयोग का कार्य भी शुरू हो चुका है॥

सन्‌ १८९० में रूमानियन प्रोफेसर को० जोजियान ने बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में पहली बार संस्कृत क ऐच्छिक विषय के रूप में पढ़ाने की व्यवस्था की। उनके इस कार्य में बो० पे० हश्देउ ने तुलनात्मक भाषातत्त्व के बारे में व्याख्यानों द्वारा सहायता दो। जोर्जियान ने उन व्याख्यानों को जनसाधारण के समझने के योग्य बनाने की कोशिश की। कुछ दिनों बाद उन्होंने बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा का बंधन हीन कोर्स खोला। इसी वर्ष संस्कृत के दूसरे विद्वान व० बुशल ने भी याशीनगर के विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा का विद्यापीठ स्थापित करने का प्रयत्न किया॥

यद्यपि इन विश्वविद्यालयों तथा अन्य स्थलों पर संस्कृत भाषा के अध्ययन का कार्य स्वेच्छपूर्वक पढ़ने वालों के लिए संस्कृत प्रेमी रूमानियन विद्वानों ने शुरू किया था, तथापि नियमित रूप से इस क्षेत्र में होने के कारण संस्कृत भाषा ने अपनी जड़े जमा लीं। सन्‌ १९५० में बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में स्थायी रूप से संस्कृत अध्यापन कार्य के लिए एक संस्कृत विभाग की निंव डाली गई। इस विभाग ने चार वर्ष का एक कोर्स चलाया। इस बिभग में रूमान्य के मशहूर प्राच्यवेत्त और संस्कृतविशेषद्य ब्लाद बनत्स्यानु ने अध्यापन किया। सन्‌ १९६२ से यह कोर्स विश्वविद्यालय की शिक्षा के कार्यक्रम में सम्मिलित कर दिया गया। इस विभाग के वर्तमान अध्यक्ष श्री त्रयान कोस्ता हैं॥

सन्‌ १९५० से सन्‌ १९६० के बीच याशिनगर के विश्वविद्यालय में भी संस्कृत का एका कोर्स चलाया गया। इस कोसे का कार्य विख्यात संस्कृत के विद्वान ते० सिमेंस्कि ने संभाला। उन्होंने संस्कृत भाषा क व्याकरण भी प्रकाशित किया। आज इन दोनों विश्विद्यालयों में संस्कृत के पैर जम गये हैं॥

हिन्दी भाषा भारत के स्वतन्त्र हो जाने और राष्ट्र भाषा के रूप में हिन्दी भाषा की घोषणा के बाद रूमानिया की रुचि भारत के प्रति और भि बढ़ने के साथसाथ हिन्दी के प्रित भी जगी है। सन्‌ १९६० से रूमानियन भाषा में प्रेमचन्दर जी के गोदानऔर श्री फणीश्वर नाथ रेणु के मैला आंचलजैसे हिन्दी के कुछ प्रमुख उपन्यासों का अनुवाद किया गया है॥

सन्‌ १९५६ ई० मेँ बुखारेस्ट में रूमानियन प्राच्य विद्या समाज की स्थापना हुई। यह समाज अनेक विभागों में बँटा हुआ है; जिनमें से एक विभाग ! भारतीय विद्यके अन्वेष्ण से संबन्धित है। भारत्य विभाग के कार्यक्रमों के अन्तर्गत इन पंक्तियों के लेखक ने हिन्दी भाषा के ढाँचे और आधुनिक हिन्दी साहित्य के बरे में कई व्याख्यान दिये हैं॥

सन्‌ १९६५ में भारतीय रूमानियन संस्कृतिक विनिमय के कार्यक्रम पर परस्पर हस्ताक्षर किये गये। इस कार्यक्रम के आधार पर बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में हिन्दी भाषा का एक प्राध्यापक भेजा। इस कार्य द्वारा रूमानिया में हिन्दी भाषा के अध्ययन की नींव रखी गयी। उसी वर्ष जाड़ों में बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में हिन्दी भाषा का ऐच्छिक पाठयक्रम चालू किया गया। नवम्बर १९६५ में भारतीय प्राध्यापक श्री इन्दु प्रकाश पाण्डेय आये। वे रूमानिया में हिन्दी भाषा के पहले प्राध्यापक थे। इन्दु प्रकाश पाण्डेय जी ने सन्‌ १९६५ से सन्‌ १९६७ तक यहाँ हिन्दी अध्यापन का कार्ये किया॥

एक वर्ष के मध्यान्तर के बाद सन्‌ १९६८ के शीतकाल में भारतीय प्राध्यापक डा० विद्यासागर जी ने हिन्दी भाषा की पढ़ाई फिर से शुरू करवायी, जो अभी बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक हैं।डा० विद्यासागर जी की रहनुमाई में कोर्स तीन विभागों में बाँटा गया; जैसे . प्रारंभिक, . पहला वर्ष और ३. उच्च पाठ्रक्रम। हिन्दी अध्यापन के अतिरिक्त यह विभाग हिन्दी भाषा और साहित्य पर व्याख्यनों तथा भारत के जीवन से सम्बन्धित संस्कृतिक , कलात्मक एवं ऐतिहासिक फिल्मों के प्रदश्शन आदि का प्राबंध करता है। आजकल भारत और रूमानिया के बीच मित्रता, आर्थिक सहयोग एवं संस्कृतिक विनिमय के सम्बन्धों के विकास की सम्भावनाएँ बहुत विस्तुत हो गई हैं। अतः हिन्दी भाषा की व्यवहारिक आवश्यकता बढ़ती जा रही है। अतएव हमें आशा है कि बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में शीघ्र ही पाँच वर्षीय हिन्दी विभाग स्थापित किया जायेगा। इस दिशा में प्रस्ताव रखा ज चुका है॥


१) श्री निकोलाय ज़्बेरिया रूमानिया निवासी हैंये दर्शन और भाषा तत्व के विद्यार्थी और विद्वान हैं। अपने हिन्दी चान का परिष्कार करने और भारतीय दर्शन का अध्ययन करने के लिए ये अक्तूबर १९६९ मै आगरा आये और केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में रहकर इन्होंने इन विषयों का एक अनुशासित शोध छात्र के रूप में अध्ययन किया श्री ज्बेर्या की विनय शीलता , मीलनसारी और अनुशासन पडुता अनुकरणीय हैं। स्वतन्त्र भारत का अन्य देशों के साथ संस्कृतिक सम्बन्ध उस मात्रा में नहिं बढ़ा है जिस मात्रा में अन्य देशों ने भारत के साथ बढ़ाया है प्रस्तुत लेख से यह साबित होता है। हिन्दी शिक्षकों का इस दिशा में विशेष उत्तरदायित्व है। सं०॥

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