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रोमानिया में हिंदी

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– निकोलाय ज़्बेरिया (१९०८-१९९०) –

विश्व हिंदी सम्मेलन अंक, १९७५

यह सर्वविदित है जर्मनी को छोड़कर, पश्चिम के सब देशों में से रोमानिया में ही भारतीय संस्कृत, दर्शन, कला, संगीत, संस्कृत भाषा तथा हिंदी के प्रति सबसे अधिक रुचि है।

रोमानिया पर भारतीय चिंतन का प्रभाव

यूरोपियनों के लिए संस्कृत भाषा के आविष्कार के कुछ समय बाद की अवधि में, १९ वीं शताब्दी के पूर्वाद्रध में, जर्मनी में फ्र० श्लेगेल, फ्र० बोष्प, व० हंबोल्द जैसे संस्कृतद्यों और भारततत्त्वविशारदों का उदय हुआ, जिनकी रचनाओं ने प्राचीन भारत की साहित्यक, दाशनिक और कलात्मक निधियों और सहस्रवर्षीय संस्कृत का आलोक अपने देशवासियों को दिया। पश्चिम के शिक्षित लोगों में से अधिकांश लोग शोपेनहाउएर के ही मध्यम से, जिसकी रचनाएँ वेदांत और बौद्ध ग्रंथों के संदर्भों से भरपूर हैं, प्राचीन भारतीय चिंतनधारा तक पहुँचे। इसी तरह सबसे बड़े रोमानियन कवि, म० एमिनेस्कु (1850-1889) ने भी प्राचीन भारतीय चिंतन का परिचय शोपेनहाउएर के माध्यम से ही प्राप्त किया था। म० एमिनेस्कु जीवन की समस्याओं और अस्तित्व की पहेलियों से बेचैन होकर उन समस्याओं के हल की खोज के लिए ऋग्वेद, उपनिषदों और बैद्ध ग्रंथों के अंतरंग में प्रविष्ट हुए। वे विचार जिनसे वे सबसे अधिक प्रभावित हुए थे और जिन्हें उन्होंने अपनी कविताओं में स्थान दिया है भारतीय ग्रंथों से ही मिले थे। म० एमिनेस्कु ने वियना और बर्लिन के विद्यार्थी जीवन में संस्कृत के अध्ययन में बहुत समय लगाकर, एक संस्कृत रोमानियन शब्दकोश बनाने का भी काम किया। लेकिन म० एमिनेस्कु के साथ ही प्राचीन भारतीय चिंतन ने दूसरे बड़े रोमानियन कवियों, लेखकों और विद्वानों पर भी गहरा प्रेभाव डाला। इस प्रकार, रोमानियन महाकवि गे० कोश्बूक (1866-1918) ने रोमानियन भाषा में अभिचान शाकुन्तलम‘, ‘ऋग्वेद”और महाभारतके कुछ खंडों का अनुवाद किया। एक रोमानियन विद्वान प्रसिद्ध भाषाविद्यानी, ब० पे० हश्देउ (1838-1907) ने संस्कृत भाषा के संबंध में रोमानियन और दूसरी भारोपीय भाषाओं पर तुलनात्मक भाषातत्त्व का बड़ा रोचक अन्वेषण किया है। 20 वीं शताब्दी में भी बहुत से रोमानियन कवि और लेखक भारतीय चिंतन से प्रभावित हुए, जैसे लुच्यान ब्लागा (कवि), इओन पिलात (कवि), मिर्चा एलियादे (लेखक और विद्वान), लिविड रेब्र्यानु (सबसे बड़ा रोमानियन लेखक उपन्यासकार) आदि इन सबसे भारत की प्राचीन या आधुनिक संस्कृत और जीवन के विषय में सुंदर पृष्ठ लिखे हैं॥

अतेव आश्चर्य की कोई बात नहीं कि रोमानियन लोगों की भारत की आध्यात्मिक संस्कृत में इतनी रुचि है। इसी कारण, रोमानिया में करीबकरीब प्रत्येक शिक्षित आदमी महाभारत‘, ‘रामायणऔर शकुंतलाके नाम से पूर्ण परिचित है॥

संस्कृत के अध्ययन और अनुवाद की परंपरा

रोमानिया में संस्कृत का अध्ययन गत शताब्दी में ही शुरू हुआ। इस अध्ययन के संस्थापक, रोमानियन विद्वान प्रो० को० जोज्यौन (1850-1904) ने, जो प्रतिष्ठित प्राच्यवेत्ता और संस्कृतय थे, सन्‌ 1890 में बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में पहली बार संस्कृत को एच्छिक विषय के रुप में पढ़ाने की व्यवस्था की। उनको इस कार्य में ब० पे० हश्देउ ने तुलनात्मक भाषातत्त्व पर व्यख्यानों के द्वारा सहायता दी। उन्हीं की कोशिशों के फलस्वरूप रोमानियन भाषा में संस्कृत से अनुवाद का काये भी प्रारंभ हुआ। प्रथम और द्वितीय विश्व महायुद्ध के बीच में संस्कृत पुस्तकों के अनुवाद का रोमानियन भाषा में ताँतासा लग गया। इन रचनाओं का प्रभाव रोमानियन रचनाओं पर भी पड़ा। इस तरह भारतरोमानियन संस्कृतिक क्षितिज और निकट आया। इस काल मेंमहाभारतऔर रामायणके कुछ भगों का अनुवाद रोमानियन भाषा में हुआ। शाकुन्तलम‘, ‘भगवद्गीता”आदि रचनाओं का भी रोमानियन भाषा में अनुवाद हो चुका है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रोमानिया यत्रा (1926) के बाद, भारत और रोमानिया के संबंध कुछ और घनिष्ट हो गए। दूसरे विश्व महायुद्ध के बाद भी रोमानिया और भारत के बीच समीपता तथा मित्रता बढ़ी। इन दोनों देशों में संस्कृतिक विनिमय का अभियान शुरू हुआ, जिसके परिणामस्वरूप इनके बीच बहुमुखी सहयोग भी शुरू हो चुका है। यद्यापि रोमानियन विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा का अध्ययन अध्यापन, स्वेच्छापूर्वक पढ़ने वालों के लिए संस्कृतप्रेमी विद्वानों ने शुरू किया था, तथापि नियमित रूप से इस क्षेत्र में काम होने के कारण संस्कृत भाषा ने अपनी जड़ें जामा लीं। सन्‌ 195० में बुखारेस्ट विश्वविद्यालय में स्थायी रूप से संस्कृतअध्यापन कार्य के लिए एक संस्कृत विभाग की नींव डाला गई। इस विभाग ने चार वर्ष का एक कोर्स चलाया। इस विभाग में रोमानियन के मशहूर प्राच्यवेत्ता और संस्कृत विशेषद्य ब्लाद बनत्स्यानु ने अध्यापन किया। फ़िलहाल इस विभाग के अध्यक्ष श्री त्रयान कोस्ता हैं। सन्‌ 1950 से याशिनगर के विश्वविद्यालय में भी संस्कृत का एक कोर्स चलाया गया। इस कोर्स का कोर्स विख्यात संस्कृत के विद्वान ते० सिमेंस्कि ने संभाला। उन्होंने संस्कृत भाषा का व्याकरण भी प्रकाशित किया। आज इन दोनों विश्वविद्यालयों में संस्कृत, अध्ययन का स्थायी विषय बन गई है॥

हिंदी के प्रति प्रेरणा

भारत के सवतंत्र हो जाने और राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी की घोषणा होने के बाद रोमानिया कि रुचि हिंदि क्र प्रति भी जागृत हुई। सन्‌ 1960 से रोमानियन भाषा में प्रेमचंद जी के गोदानऔर श्री फणीश्वर नाथ रेणु केमैला आंचलजैसे हिंदी के कुछ प्रमुख उपन्यासों का अनुवाद किया है। सन्‌ 1956 में बुखारेस्त में रोमानियन प्राच्य विद्या समाज! की स्थापना हुई। यह समाज अनेक वुभागों में बँटा हुआ है, जिनमें से एक विभाग भारतविद्याके अन्वेषण से संबंधित है। भारतीय विद्य के कार्यक्रमों के अंतर्गत इन पंक्तियों के लेखक ने हिंदी भाषा के स्वरूप और आधुनिक हिंदी साहित्य के बारे में कई व्याख्यान दिए हैं॥

हिंदी का अध्यापन

सन्‌ 1965 में भारतीयरोमानियन संस्कृतिक विनिमय के कार्यक्रम पर हस्ताक्षर किए गए। इस कार्यक्रम के आधार पर बुखारेस्त विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा का एक प्राध्यापक भेजा गया। इससे रोमानिया में हिंदी भाषा के अध्यापन की नींव रखी गई। नवंबर 1965 में भारतीय प्राद्यापक, हिंदी कवि और लेखक, श्री इंदु प्रकाश पांडेय ने रोमानिया आकर बुखारेस्त विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा का पाठ्यक्रम चालू किया। यह हिंदी कोर्स ऐच्छिक कोर्स था। श्री इंदुप्रकाश पांडेय ने सन्‌ 1965 से 1967 तक बुखारेस्त में हिंदी अध्यापन का कार्य किया। इस अवधि में, उन्होंने रोमानियन विद्यार्थियों के लिए, रोमानियन में पहली हिंदी पाठ्यपुस्तक बनाई थी जो सन्‌ 1967 में बुखारेस्त विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की गई। भारतीय विद्या, हिंदी साहित्य, भारतीय संगीत, कला और फ़िल्म पर दिए गए अपने व्याख्यानों से वे रोमानियन श्रीताओं में हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृत के लिए और अधिक रुचि उत्पन्न करते रहे॥

सितंबार सन्‌ 1968 में, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डो. प्रभु दयाल विद्यासागर ने रोमानिया आकर, बुखारेस्त विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा की पढ़ाई फिर से शुरू करवाई। पहले दो अध्ययनवर्षों के भीतर, उन्होंने ऐच्छिक कोर्स के हिंदी अध्यापन का कार्य किया॥

हिंदी के उच्च शिक्षण की व्यवस्था

1971 के वसंत से लेकर रोमानियन सरकार ने बुखारेस्त विश्वविद्यालय में चतुर्वर्षीय हिंदी विभाग स्थापित करने का निर्णय लिया और इसका उद्घाटन समारोह 12 मार्च, 1971 को हुआ। भारतीय संस्कृतिक संपर्क परिषद, दिल्ली ने विद्यासागर जी के कार्यकाल को दो वर्ष के लिए जारी रखा। इसके परिणाम स्वरूप हिंदी विभाग के पहले और दूसरे वर्ष का अध्यापन उनके मार्गदर्शन में कार्यान्वित हुआ। साथ ही विभाग के हिंदी के सहायक अध्यापकों के रूप में श्री निकोलाय ज्बेया और लौरेंत्सिउ थेबान की भी नियुक्ति की गई थी। उसी समय ऐच्छिक कोर्स भी चालू हुआ जो इन दो अवस्थाओं में बाँटा गया है: प्रारंभिक और उच्च पाठ्रक्रम॥

विश्वकोश की योजना

अपने चार साल के कार्यकाल में डो. विद्यासागर ने रोमानियन विद्यार्थियों के लिए एक विशालकाय पाठ्पुस्तक तैयार की और विस्तुत हिंदीरोमानियन शब्दकोश (चार खंडों में) के निर्माण का सूत्रपात किया। अब तक, पहला खंड (से तक) प्रकाशित हो चुका है। फिलहाल सब सामग्री तैयार है और प्रकाशन की प्रतिक्षा कर रही है। शब्दकोश के संपादकमंडल में निम्नलिखित सदस्य थे: डां० प्रोफे० प्रभुदयाल विद्यासागर, अस० निकोलाय ज़्बेयों; अस० लौरेंत्सिउ थेबान, अस० इओन पेत्रेस्कु, हिंदी विभाग के विद्यार्थी: मारिया पोपेस्कु, अंका रोमान, कर्मेंचीता बत्रीनु मनुयेला माय्यास, आरा शिशमन्यान, और ऐच्छिक कोर्स के विद्यार्थी: आंद्रा व्लदेस्कु, इओन कुलियानु, द्रगोमीर कोस्तिन्यानु, इरेना इबनेस्कु, दाना पोपेस्कु। दूसरे, तीसरे और चौथे खंडों के बनाते का काम, अस० इओन पेत्रेस्कु जी के विशेष मार्गनिर्देशन में था (उस समय डो. विद्यसागर भारत लौट चुके हुए थे) इन तीन खंडों की तैयरी में उनका योगदान बहुत बड़ा था। अंतिम समय में पेत्रेस्कु जी ऐच्छिक कोर्स के विद्यार्थियों को भी पढ़ाया॥

अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाने के उद्देश्य से डो. विद्यासागर ने याशिनगर के विश्वविद्यालय में भी एक ऐच्छिक कोर्स खोल दिया। हर सप्ताह याशिनगर जाकर उन्होंने वहां जो कार्य किया उसमें उन्हें वास्तविक सफलता मिली। हिंदी अध्यापन के अतिरिक्त, उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य पर कुछ लेख लिखे और भारत के जीवन से संबंधित संस्कृतिक, कलात्मक एवं ऐतिहासिक फिल्मों के प्रदर्शन का भी प्रबंध किया। वे 19 जून, 1972 को भारत लौट गए॥

23 मार्च, 1973 को तीसरे भारतीय प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डो. इंद्रनाथ चौधुरी रोमानिया आए। उन्होंने तीसरे वर्ष के विद्यार्थियों को एक छमाही कोर्स पढ़ाया और अगले साल सरकारी इम्तहान के लिए उन्हीं विद्यार्थियों को (चौथे वर्ष) तैयार कर दिया। भारतीया संस्कृत और सभ्यता के इतिहास में विद्यार्थियों की जानकारी पूर्ण करने प्रोफे० डो. च० पोगीर्क और डो. आलज्यो्गे ने व्यख्यान दिए। उसी विषय पर दिल्ली की प्राध्यापिका श्रीमती उषा चौधुरी जी ने दो छमाही के भीतर विशेष व्याख्यान दिए। परीक्षा के लिए डो. चौधुरी जी डिप्लोमानिबंध तैयार करने के इच्छुक विद्यार्थियोंकों स्वयं सहायता दी। डो. चौधुरी जी ने प्रतिभासंपत्र शिक्षाशस्त्री की भांति भारतीय संस्कृत तथा कला के प्रति रोमानियन जनता की विशेष अभिरुचि जागृत की। इसका उल्लेख उन्होंने 18 नवंबर, 1973 के नवभारत टाइम्स! (रविवारिय परिशिष्ट) में प्रकाशित हुए डेन्यूब के किनारे संस्कृत, हिंदी तथा हिंदी संगीत का प्रचारनामक एक अत्यंत रोचक लेक में किया है। डो. चौधरी 15 मैद, 1974 को भारत वापस चले गए। बुखारेस्त में डो. चौधरी के रहने के समय 15 फरवरी, 1974 को, ‘रोमानियनभारतीय मित्रता समाज भी स्थापित किया गया था॥

फिलहाल चतुर्वष्य हिंदी विभाग के पांच विद्यार्थी सरकारी एम० ए० परिक्षा पस कर चुके हैं। उन्होंने रोमानिया में हिंदी भाषा की पहली कक्षा स्थापित की। इस तरह बड़ी कोशिशों के फलस्वरूप आज रोमानिया में हिंदी भाषा के कुशल कार्यकर्ताओं का समूह उत्पत्र हो गया है॥

हिंदी पुस्तकालय

दो शब्द बुखारेस्त के हिंदी पुस्तकालय के बारे में। यह पुस्तकालय रोमानियन प्राच्य विद्या समाज के पुस्तकालय का भाग है। हिंदी पुस्तकालय में अध्यकांशतः पुस्तकें दिल्‍ली के भारतीय शिक्षामंत्रालय की और से उपहार हैं। साधारणतः वे ललित साहित्य की पुस्तकें है। शिक्षण की प्रत्रिया में उनका काफ़ी उपयोग किया जाता है। तो भी, चूँकि ऐच्छिक कोर्स में विद्यार्थियों की संख्या आमतौर पर बढ़ी है (15-20-25 विद्यार्थियों तक) हिंदीअंग्रेजी और अंग्रेजी हिंदी शब्दकोश तथा वैद्यानिक अध्ययन पुस्तकों (व्याकरण, इतिहास प्राणिशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र, प्रकृतिशास्त्र, भूगोल, भैतिकी, रसायनविद्यान, जीवविद्यान, मनोविद्यान आदि) की बड़ी आवश्यकता है। वैद्यानिक परिभाषा का अध्ययन करने के लिए ऐसी पुस्तक जस्वरी हैं॥

शोधलेख

अब हमारे हिंदी प्रकाशन कार्य के संबंध में। अब तक, श्री ल० थेबान ने आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान की गवेषणामें हिंदी भाषा का मूलभूत वाक्य वीन्यास प्रकाशत किया। इस लेख के लेखक ने धर्मयुग के 19 जुलाई, 1970 के अंक में एक रोमानियन यात्री की रोमांचक आध्यात्मिक यात्रा‘, आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान के समन्वयमें भारत और रोमानिया का संस्कृतिक संबंध ‘; 1 दिसम्बर, 1973 के परागमें एक रोमनियाई दंतकथा आदि प्रकाशित किए। साथ ही पाठ्यपुस्तकों के बनाने में भारतीय प्राध्यापकों को सहायत दी॥

हिंदी के अध्यापन, हिंदी विभाग कि स्थापन और हिंदी पुस्तकालय के निर्माण में पूर्वी भाषाओं के चानपीठ के अध्याक्ष, प्रोफे० डो. चिचेरोने पोगीर्क के योगदान के बारे में कुछ शब्द कहे बीना में यह लेख समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने हिंदी पाद्यपुस्तक तैयार करने और हिंदीरोमानियन शब्दकोश बनाने में पूरी सहायत की। रोमानियन प्राच्य विद्य समाजके सभाध्यक्ष के रूप में उन्होंने हिंदी पुस्तकालय को इस संस्था में स्थापित किय। उनका हिंदी के प्रति असीम प्रेम है। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगर के निदेशक डो. ब्रजेश्वर वर्मा ने भी हमें निस्वार्थ मदद दी है॥

इस वर्ष 16 जुलाई को एक नए रोमानियनभारतीय संस्कृतिक विनिमय के कार्यक्रम पर परस्पर हस्ताक्षर किए गए। यह संधि रोमानिया में हिंदी भाषा के अध्यापन के लिए नई और विशाल संभावनाओं का द्वार खोल रही है॥

रयदि इस लेख में सम्पादकीय टिप्पणी के रुप में आगे का सक्षिप्त बिवरण दे फुट नोट के रुपयें दिया जाये तो आलेख ओर महत्वपूर्ण होगा।

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