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श्री ज्वेर्या का पत्र

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– निकोलाय ज़्बेरिया (१९०८-१९९०) –

“समन्वय” 1970-1971 1969-70 के सत्र में रूमनिया के एक अवकाप्राप्त सैनिक उच्चाधिकारी श्री निकोलाई ज्बेया जिनकी उम्र समय 67 वर्ष थी संस्थान हिन्दी का अध्ययन करने के लिए आए थे। श्री ज्बेयां की हिन्दी और भारतीय संस्कृत के प्रयि इतनी गहरी अभिरुचि है कि उन्होंने दोनों और की यात्रा निजी खर्च से की और संस्थान के छात्रावास में छः महीने तक सामान्य विद्यार्थी की तरह सादा जीवन बीताया। संस्थान में अध्ययन करने के फलस्वरूप श्री ज़्बेयों को बुखारेस्त विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन कार्य मिला है॥

संस्थान के पुराने छात्रों के ऐसे रोचक पत्र समन्वय के आगामी अंकों में
भी देते रहने का विचार है॥

सम्पादक


बुखारेस्त
26 मार्च 1971

परमादरणीय निदेशकजी,

आपक 14-10-70 और 3-3-71 के दोनों पत्र मिल गये थे। समन्वयकी चार प्रतियाँ भी मिलीं। सबके लिए मेरा हार्दिक धन्यवाद स्वीकार कीजिये। मैं आशा करता हूँ कि आपको दीवाली के त्योहार के लिए बधाई देने का मेरा पत्र भी मिला होगा, जिसको मैंने आपको सत्रिपात से 14-10-70 को ही भेजा। मैंने आपके 14-10-70 के पत्र का उत्तर विशेष रूप से नहीं लिखा, क्योंकि बारबार कुछ शुभसमाचारों की प्रतीक्षा थी, जिनकी सूचना मैं आपको देना चाहता था। चाहे जो ही, मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ कि मैंने आपके 12-10-70 के पत्र पर सीधे रूप से उत्तर नहीं दिया। अब, बहु अभिलषित घटनाएँ घट जाकर, मैं आपको आनंद से उनके बारे में सूचित कर सकता हँ। अपने स्मृतिपत्र के मारे, जो मैंने हमारी सरकार के सामने पेश किया, हमारे शिक्षा मंत्रालय ने 1 मार्च से बुखारेस्त के विश्वविद्यालय में हिन्दी पाँच वर्षीय विभाग स्थापित करने का निर्णय कर लिया। चूँकि विद्यासागरजी, जो 1970-1972 के अध्ययन के वर्षों के लिये भारतीय शिक्षामंत्रालय के द्वारा बुखारेस्त के विश्वविद्यालय के लिए फिर से नियुक्त किये गये थे, अब तक बुखारेस्त नहीं आये, तो डां विद्यासागर के आने तक, हमारे शिक्षा मंत्रालय ने मेरी और एक दूसरी रूमानियन भाषातत्त्वविद्य की हिन्दी अध्यापक के रूप में नियुक्ति की॥

जैसा कि देखा जाता है, आर्थिक, नैतिक तथा शिक्षा सम्बन्धी सहायता, जो आपने मुझे दी, व्यर्थ नहिं थी। आपके और आप के सहकर्मियों के कार्य एवं प्रयत्नों की बदौलत, अब मैं हिन्दी का प्रचारक हो गया हूँ। इस अवसर पर मुझे आपके तथा उनके प्रति एक बार और अपना धन्यवाद एवं आभार प्रकट करने की अनुमति दीजिये॥

अब मैं अपना पूरा बल लगा रहा हूँ, ताकि अपना कत॑व्य सम्मानपूर्वक पुरा करूँ॥

दूसरा शुभ समाचार यह है कि हमारा प्राच्यविद्याविभाग स्वाधीन प्राच्यविद्यासमाज मैं परिवर्तित हो गया । इस समाज मैं भारततत्त्व के विभाग ने महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण किया। अब मैं इस विभाग का प्रबन्ध कर रहा हूँ॥

धर्मयुग” वाले मुझे 19 जुलाई के अंक की दो प्रतियाँ भेज चुके। सोचता हूँ कि रेड्डी जी को भी लेख का पारीश्रमिक मिला। मैंने धर्मयुगके प्रधान संपादक को लिखा था कि वे उनके लेख का पारिश्रमिक भिजवाएँ। मैंने शब्द प्रति शब्द लिखा: ‘लेख का पारिश्रमिक मेरे मित्र, श्री विजय राघव रेड्डी को , जिसने आगरे में अपने रहते समय मुझे मदद दी, कृपया भिजवा दें। उपरोक्त धन मैं उनहें, उनके विवाह के शुभ अवसर पर उपहारस्वरूप देना चाहता हूँ। कृपया भिजवाने का कष्ट कीजियेगा।मैंने रेड्डीजी से प्रार्थना की कि वे मुझे परिणाम के बारे में लिखें, पर मेरी प्रतीक्षा व्यर्थ थी। मेरा अभिप्राय यह था कि उस अवस्था में कि उनको पारिश्रमिक नहिं मिला, तो मैं प्रधान संपादक को फिर से लिखूँ॥

मेरी हिंदी पढ़ाई ठीक तरह चल रही है। हमारे पास हिन्दी पाठयपुस्तक है। किन्तु हमारे पास हिन्दीरूमानियन तथा रूमानियनहिन्दी श्ब्दकोष नहीं है। इसलिए मैं ये दोनों शब्दकोष बनना चाहता हूँ। अगर विद्यासागर जी या दूसरा भारतीय अध्यापक आयेंगे, तो हम एक साथ दोनों शब्दकोष तैयार करेंगे॥

माननीय निदेशक जी मेरी आपसे प्रार्थना है। मैंने सुना कि राजस्थान में (जयपुर में?) पुनर्जन्म की समस्याओं के लिए वैचनिक अनुसंधानशाला है। हमारे यहाँ मैं और दूसरे लोग इसमें दिलचस्पी लेते हैं। अगर आपको इस संस्थान के बारे में कुछ मालूम है, सबसे पहले उसका पता और निदेशक का नाम, तो कृपय मेरी सूचना दीजिये॥

इस वर्ष की होली कब है मैं नहीं जानता। बहर हाल इस दिलचस्प त्योहार के मेरी शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिये॥

वादा किया हुआ प्रकाशनों तथा पत्रिकाओं के भिजवाने के लिए ही अनेक घन्यवाद॥

विस्तुत उत्तर देर से देने के लिए एक बार और क्षमा चाहता हूँ। मैं आपको एक क्षण भी विस्मृत नहीं कर रहा हूँ। आगरे में बीते सुन्दर दिन मुझे सदा याद रहेंगे॥

आशा है, आप सब लोग अच्छे होंगे। हम स्वस्थ एवं प्रसन्न हैं। मेरी पत्नी श्रीमता वर्मा तथा आपको अपने नमस्कार भेज रही हैं। अपनी और से आपका श्रीमती जी को मेरा सादर नमस्ते कहियेगा। दोनों की और से आपकी पुत्रियों एवं पुत्रों को स्नेह। मेरे अध्यापकों और संस्थान के सभी लोगों को अपना नमस्कार कर रहा हूँ॥

आपका विनीत
नि० ज़्बेयां

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